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                      दोस्ती


दर्द में कुछ कमी-सी लगती है
जिन्दगी अजनबी-सी लगती है

एतबारे वफ़ा अरे तौबा
दुश्मनी दोस्ती-सी लगती है

मेरी दीवानगी कोई देखे
धुप भी चांदनी-सी लगती है

सोंचता हूँ की मैं किधर जाऊँ
हर तरफ रौशनी-सी लगती है

आज की जिन्दगी अरे तौबा
मीर की सायरी सी लगती है

शाम-ऐ-हस्ती की लौ बहुत कम है
ये सहर आखरी-सी लगती है

जाने क्या बात हो गयी यारों
हर नजर अजनबी-सी लगती है
दोस्ती अजनबी-सी लगती है.......

Comments

  1. ijhoijjmgp;okgjd

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  2. dusmano se dosti karna bhi mahnga aur dosto se dusmani banana bhi mangha hota hai

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100 ka note

बापू , बहुत पीड़ा होती है  तुम्हारी मुस्कुराती तस्वीर  चंद हरे पत्तों पर  देख कर  जिसको  पाने की चाह में  एक मजदूर  करता है दिहाडी  और जब शाम को  कुछ मिलती है  हरियाली  तो रोटी के  चंद टुकड़ों में ही  भस्म हो  जाती है  न जाने कितने  छोटू और कल्लू  तुमको पाने की  लालसा में  बीनते हैं कचरा  या फिर  धोते हैं झूठन  पर नहीं जुटा पाते  माँ की दवा के पैसे  और उनका  नशेड़ी बाप  छीन ले जाता है  तुम्हारी मुस्कुराती तस्वीर  और चढा लेता है  ठर्रा एक पाव . बिना तुम्हारी तस्वीरों को पाए  जिंदगी कितनी कठिन है गुजारनी  इसी लिए न जाने कितनी बच्चियाँ झुलसा देती हैं अपनी जवानी .  देखती होगी  जब तुम्हारी  आत्मा  अपनी ही मुस्कुराती तस्वीर  जिसके न होने से पास  किसान कर रहे हैं  आत्महत्या  छोटू पाल रहा है  अपनी ही लाश  न जाने कितनी बच्चियां  करती हैं...
जब  भी  कभी दोस्त   मुझे , 2 पेग  व्हिस्की  देते  थे  मैं  झूल   जाता  था  माँ , मेरी  नज़र  ढूंढें  ठेके , सोचु  यही  तू  मुझको  नज़र  न  आ जाये  माँ  दारू  मैं  इतना  पिता  नहीं , पर  मैं  सहम  जाता  हूँ  माँ , चेहरे  पे  आने  देता  नहीं , लेकिन  मैं  लुडक  जाता  हूँ  माँ , तुझे  सब  है  पता  है  ना  माँ  ….
इसी तरह भागोगे तो ज़ल्दी ठहरना पड़ सकता है  ये मेरी पत्रकारिता के जीवन में कभी नही हुआ . कभी मै अपनी इस बात को घर वालो से  नहीं बता सका , आज १० साल बाद मुह खोला है , कानपूर में एक लड़की के साथ कुछ लडको ने छेड़खानी कर दी , ३-४ दिन बाद स्कूल से निकलते वक्त फिर छेड़खानी हुई , लड़की अशोक नगर के एक गिर्ल्स कॉलेज में थी . घटना का किसी ने मुद्दा नही बनाया, घटना के ६ दिन बाद मेरे को जानकारी हुई तो मैंने छेड़खानी पर एक स्टोरी अपने नाम से पेपर में छापी , स्टाफ मेम्बर ने भी उस खबर की तारीफ की , स्टोरी में उस लड़की के साथ हुई घटना का ज़िक्र भी था , खबर पढकर दुसरे पेपर वाले भी अगले दिन उसके घर पहुचे , सभी ने अपने अपने हिसाब से खबर छापी,, अगले ही दिन लड़की ने पेपर में अपने आप को पाकर फासी लगा ली , आज मै पत्रकारिता से दूर हु , टीचेर हो गया हु लकिन उसकी मौत का ज़िम्मेदार सीधे तौर पर अपने आपको ही मानता हु  पवन त्रिपाठी एल्लाहाबाद