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dosti

दोस्ती का pehala paigaam आपके नाम,
jindgi की आखिरी saans आपके नाम,
रहे सलामत ये दोस्ती अपनी,
बनना सलामत rakhana आपका काम.
`
हर कर्ज़ दोस्ती का ada कौन करेगा,
jub हम हाय  rahenge यद्यपि दोस्ती कौन करेगा,
ऐ खुदामेरे दोस्त मैं salaamat रखना,
मेरे जीने की दुआ कौन करेगा वर्ण!
`
हर दुआ kubul नही होती,
हर aarzu पुरी नही होती ...
Jinke दिल मुझे आप जैसे दोस्त rehte हो,
उनके लिए धड़कन भी jaruri नही ... होती.
`
Haquiqat मोहब्बत की judai होती हैं.
प्यार हो सकता है सिर्फ ruswai होती हैं.
हमारी तरफ हाथ देखो के लिए बड़ा कर.
दोस्ती हो सकता है कितनी sachaai होती हैं.
`
दिल मुझे तुम्हारे अपनी kami chood जाएंगे,
Ankhome intezar की lakir chood जाएंगे,
याद रखना dhundte rahoge hame
दोस्ती की ऐसी कहानी chood जाएंगे.

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100 ka note

बापू , बहुत पीड़ा होती है  तुम्हारी मुस्कुराती तस्वीर  चंद हरे पत्तों पर  देख कर  जिसको  पाने की चाह में  एक मजदूर  करता है दिहाडी  और जब शाम को  कुछ मिलती है  हरियाली  तो रोटी के  चंद टुकड़ों में ही  भस्म हो  जाती है  न जाने कितने  छोटू और कल्लू  तुमको पाने की  लालसा में  बीनते हैं कचरा  या फिर  धोते हैं झूठन  पर नहीं जुटा पाते  माँ की दवा के पैसे  और उनका  नशेड़ी बाप  छीन ले जाता है  तुम्हारी मुस्कुराती तस्वीर  और चढा लेता है  ठर्रा एक पाव . बिना तुम्हारी तस्वीरों को पाए  जिंदगी कितनी कठिन है गुजारनी  इसी लिए न जाने कितनी बच्चियाँ झुलसा देती हैं अपनी जवानी .  देखती होगी  जब तुम्हारी  आत्मा  अपनी ही मुस्कुराती तस्वीर  जिसके न होने से पास  किसान कर रहे हैं  आत्महत्या  छोटू पाल रहा है  अपनी ही लाश  न जाने कितनी बच्चियां  करती हैं...
जब  भी  कभी दोस्त   मुझे , 2 पेग  व्हिस्की  देते  थे  मैं  झूल   जाता  था  माँ , मेरी  नज़र  ढूंढें  ठेके , सोचु  यही  तू  मुझको  नज़र  न  आ जाये  माँ  दारू  मैं  इतना  पिता  नहीं , पर  मैं  सहम  जाता  हूँ  माँ , चेहरे  पे  आने  देता  नहीं , लेकिन  मैं  लुडक  जाता  हूँ  माँ , तुझे  सब  है  पता  है  ना  माँ  ….
इसी तरह भागोगे तो ज़ल्दी ठहरना पड़ सकता है  ये मेरी पत्रकारिता के जीवन में कभी नही हुआ . कभी मै अपनी इस बात को घर वालो से  नहीं बता सका , आज १० साल बाद मुह खोला है , कानपूर में एक लड़की के साथ कुछ लडको ने छेड़खानी कर दी , ३-४ दिन बाद स्कूल से निकलते वक्त फिर छेड़खानी हुई , लड़की अशोक नगर के एक गिर्ल्स कॉलेज में थी . घटना का किसी ने मुद्दा नही बनाया, घटना के ६ दिन बाद मेरे को जानकारी हुई तो मैंने छेड़खानी पर एक स्टोरी अपने नाम से पेपर में छापी , स्टाफ मेम्बर ने भी उस खबर की तारीफ की , स्टोरी में उस लड़की के साथ हुई घटना का ज़िक्र भी था , खबर पढकर दुसरे पेपर वाले भी अगले दिन उसके घर पहुचे , सभी ने अपने अपने हिसाब से खबर छापी,, अगले ही दिन लड़की ने पेपर में अपने आप को पाकर फासी लगा ली , आज मै पत्रकारिता से दूर हु , टीचेर हो गया हु लकिन उसकी मौत का ज़िम्मेदार सीधे तौर पर अपने आपको ही मानता हु  पवन त्रिपाठी एल्लाहाबाद