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                                                            MERI MAA


                                                       प्यारी माँ
तू कैसी है
क्या मुझको याद करती है
तूने पूछा था कैसा हूँ मै
मै अच्छा हूँ
तेरी ही सोच के जैसा हूँ
यंहा सब सो गए हैं
मै अकेला बैठा हूँ
सोचता हूँ
क्या करती होगी तू
काम करते करते
बालों का जूडा बनाती होगी
या फिर
बिखरे समानो को समेटती होगी
पर माँ
अब समान फैलाता होगा कौन
मै तो यंहा बैठा हूँ मौन
सुनो माँ
तुमने सिखाया था
सच बोलो सदा
आज जो सच बोला
तो क्लास के बाहर खड़ा था
तुमने ने जैसा कहा है
वैसा ही करता हूँ
ख़ुद से पहले
ध्यान दुसरों का रखता हूँ
पर देखो न माँ
सब से पीछे रह गया हूँ
सब कुछ आता है मुझको
फ़िर भी
टीचर की निगाह से गिर गया हूँ
किसी पे हाथ न उठाना
तुम ने कहा था
पर जानती हो माँ
आज
उन्होंने बहुत मारा है मुझे
जवाब मै भी दे सकता था
पर मारना तो
बुरी बात है न माँ
यंहा सभी मुझे
बुजदिल समझते हैं
मै कमजोर नही हूँ
मै तो तेरा बहादुर बेटा हूँ
हूँ न माँ
अब तुम ही कहो
क्या मै
कुछ ग़लत कर रहा हूँ
तेरा कहा ही तो कर रहा हूँ
तू तो
ग़लत हो सकती नही
फिर सब कुछ
क्यों ग़लत हो रहा है
बताओ न माँ
क्या
इनको ये बातें मालूम नही
माँ
एक बार यहां आओ न
जो कुछ मुझे बताया
इन्हे भी समझाओ न
एक बात बताओ
क्या आज भी तू कहेगी
कि तुझे मुझपे गर्व है
माँ बोलो न
क्या मै तेरी सोच के जैसा हूँ
और तेरा राजा बेटा हूं!

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100 ka note

बापू , बहुत पीड़ा होती है  तुम्हारी मुस्कुराती तस्वीर  चंद हरे पत्तों पर  देख कर  जिसको  पाने की चाह में  एक मजदूर  करता है दिहाडी  और जब शाम को  कुछ मिलती है  हरियाली  तो रोटी के  चंद टुकड़ों में ही  भस्म हो  जाती है  न जाने कितने  छोटू और कल्लू  तुमको पाने की  लालसा में  बीनते हैं कचरा  या फिर  धोते हैं झूठन  पर नहीं जुटा पाते  माँ की दवा के पैसे  और उनका  नशेड़ी बाप  छीन ले जाता है  तुम्हारी मुस्कुराती तस्वीर  और चढा लेता है  ठर्रा एक पाव . बिना तुम्हारी तस्वीरों को पाए  जिंदगी कितनी कठिन है गुजारनी  इसी लिए न जाने कितनी बच्चियाँ झुलसा देती हैं अपनी जवानी .  देखती होगी  जब तुम्हारी  आत्मा  अपनी ही मुस्कुराती तस्वीर  जिसके न होने से पास  किसान कर रहे हैं  आत्महत्या  छोटू पाल रहा है  अपनी ही लाश  न जाने कितनी बच्चियां  करती हैं...
जब  भी  कभी दोस्त   मुझे , 2 पेग  व्हिस्की  देते  थे  मैं  झूल   जाता  था  माँ , मेरी  नज़र  ढूंढें  ठेके , सोचु  यही  तू  मुझको  नज़र  न  आ जाये  माँ  दारू  मैं  इतना  पिता  नहीं , पर  मैं  सहम  जाता  हूँ  माँ , चेहरे  पे  आने  देता  नहीं , लेकिन  मैं  लुडक  जाता  हूँ  माँ , तुझे  सब  है  पता  है  ना  माँ  ….
इसी तरह भागोगे तो ज़ल्दी ठहरना पड़ सकता है  ये मेरी पत्रकारिता के जीवन में कभी नही हुआ . कभी मै अपनी इस बात को घर वालो से  नहीं बता सका , आज १० साल बाद मुह खोला है , कानपूर में एक लड़की के साथ कुछ लडको ने छेड़खानी कर दी , ३-४ दिन बाद स्कूल से निकलते वक्त फिर छेड़खानी हुई , लड़की अशोक नगर के एक गिर्ल्स कॉलेज में थी . घटना का किसी ने मुद्दा नही बनाया, घटना के ६ दिन बाद मेरे को जानकारी हुई तो मैंने छेड़खानी पर एक स्टोरी अपने नाम से पेपर में छापी , स्टाफ मेम्बर ने भी उस खबर की तारीफ की , स्टोरी में उस लड़की के साथ हुई घटना का ज़िक्र भी था , खबर पढकर दुसरे पेपर वाले भी अगले दिन उसके घर पहुचे , सभी ने अपने अपने हिसाब से खबर छापी,, अगले ही दिन लड़की ने पेपर में अपने आप को पाकर फासी लगा ली , आज मै पत्रकारिता से दूर हु , टीचेर हो गया हु लकिन उसकी मौत का ज़िम्मेदार सीधे तौर पर अपने आपको ही मानता हु  पवन त्रिपाठी एल्लाहाबाद